Friday, 12 August 2022
क्या मिला तुझे....
फिर से ईश्क करते हैं
Saturday, 29 May 2021
आज भी देखा उसे....
Friday, 27 July 2018
आईना
आईना धुँधला गया है,परछाइयों की तलाश में,यह शदी इस कदर बदगुमां होगी यकीं न था,
अब नही देता कोई दादाजी को ऐनक
और दादी को हुक्का
रिश्तों की गहराई को नफरत की ऊँचाई ने पाट दिया है
और अपनेपन को तो जैसे दीमक ने चाट दिया है, त्यौहारों पर पकवान की कोई खुशबू नही आती, शायद इसीलिए अब उनके होने की
भनक भी नही आती,
पहले परिवार में कुछ पड़ोसियों की भी गिनती थी, अब तो उसमें माँ-बाप भी नही आते
आज भी याद है मुझे वो दिन
जब बचपन में दादाजी के पैर दबाने के लिए,
बच्चे आपस में लड़ बैठते थे,
फिर दादाजी के सुलह कराने के बाद,
सब मिलकर शरीर का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा दबाते थे जब कभी मन होता तो उनके साथ गांव के खेत खलिहान घूमने निकल जाते
तो कभी उन्हें घोड़ा बनाकर उनकी पीठ पर बैठकर मस्ती भी करते,
कभी उनके कुर्ते से बीड़ी निकाल कर गायब कर देते तो कभी मिट्टी वाली चिलम छुपाकर उन्हें परेशान भी करते।
आज भी याद है मुझे वो दिन
जब हम दादी के पास इकट्ठे होकर,
परियों वाली एक ही कहानी हर रोज़ सुना करते थे, मगर आज तो सबकी अपनी-अपनी ही कहानी है
इस बेवजह व्यस्त दुनिया में
दादाजी भी उन्हें अकेला छोड़ गए
अब नही बैठता कोई भी, दादी के पास
नही सुनता उनकी कहानियों को अब कोई
उन कहानियों में अब धूल की
एक परत सी जम गयी है,
शायद इसीलिए आईना धुँधला गया है.....
Saturday, 9 December 2017
तुमसे मिलकर
मिलकर तुमसे मैने जाना, जीने का अंदाज़ हो तुम ,
हंसी लबों पर हया आँख में,खाबों की परवाज़ हो तुम।
कदम-कदम पर ठोकर खाया,दुनिया से ना सम्भल सका,
तूने उठा दिया पल भर में,एक अनोखा राज़ हो तुम।
मिलकर तुमसे......
तेरी यादों के बदले में , मैने सब कुछ तुम्हे दिया,
चुप रहके सब कुछ कह डाला,निःशब्द कोई आवाज़ हो तुम।
मिलकर तुमसे......
आंखों में तस्वीर है तेरी,धड़कन में भी तुम्ही प्रिये,
हर आहट संगीत है तेरी,दिल का मेरे साज़ हो तुम।
मिलकर तुमसे......
Sunday, 30 July 2017
मेरी बेटी
भीड़ में दुनिया की मैं,खुद को तन्हा पाता हूँ
समझ न आने वाली , उलझने सुलझता हूँ
थका हारा हुआ पहुँचता हूँ,जब घर वापस
नन्ही बाँहों में उसकी,जाकर सिमट जाता हूँ
दूर हूँ उससे तो ,एहसास हो रहा है मुझे
बग़ैर उसके मैं तो , जीता हूँ न मरता हूँ
हाँ मैं मेरी बेटी से ,माँ की तरह प्यार करता हूँ।
हाँ मैं मेरी बेटी से ,माँ की तरह.....
वो पांच मिनट का निवाला,मुझे पचास मिनट में खिलाना
वो अपने दिनभर की बातें,मुझे देर रात तक सुनाना
उसके सर से जो कभी,हाथ मेरा हट जाए
तो नींद में भी रोते-रोते,पापा-पापा चिल्लाना
बड़ी होकर वो मुझसे दूर चली जायेगी
बस यही सोचकर दिनरात आह भरता हूँ
हाँ मैं मेरी बेटी से, माँ की तरह प्यार करता हूँ।
हाँ मैं मेरी बेटी से ,माँ की तरह....
Tuesday, 16 May 2017
लगता है कोई अपना है
दूर कहीं से आहट आई लगता है कोई अपना है,
कहते हैं ये हवा के झोंके लगता है कोई अपना है।
खो गया है करार दिल का मारा -मारा फिरता हूँ,
किसने किया है हाल ये मेरा लगता है कोईअपना है।
सात समंदर पार बिठाकर मुझको तन्हा छोड़ दिया दिल उसे फिर भी दुआ देता है लगता है कोई अपना है।
किसको निगाहें ढूंढ रही हैं किसकी बातें करती हैं,किसकी याद रुला देती है लगता है कोई अपना है।
दर्द हमेशा ही देता है मुझको सताता है फिर भी,
उसपे हमेशा प्यार आता है लगता है कोई अपना है।