Sunday, 30 July 2017

मेरी बेटी

भीड़ में दुनिया की मैं,खुद को तन्हा पाता हूँ
समझ न  आने वाली , उलझने सुलझता हूँ
थका हारा हुआ पहुँचता हूँ,जब घर वापस
नन्ही बाँहों में उसकी,जाकर सिमट जाता हूँ
दूर हूँ उससे तो ,एहसास हो रहा है मुझे
बग़ैर उसके मैं तो , जीता हूँ न मरता हूँ
हाँ मैं मेरी बेटी से ,माँ की तरह प्यार करता हूँ।
हाँ मैं मेरी बेटी से ,माँ की तरह.....
वो पांच मिनट का निवाला,मुझे पचास मिनट में खिलाना
वो अपने दिनभर की बातें,मुझे देर रात तक सुनाना
उसके सर से जो कभी,हाथ मेरा हट जाए
तो नींद में भी रोते-रोते,पापा-पापा चिल्लाना
बड़ी होकर वो मुझसे दूर चली जायेगी
बस यही सोचकर दिनरात आह भरता हूँ
हाँ मैं मेरी बेटी से, माँ की तरह प्यार करता हूँ।
हाँ मैं मेरी बेटी से ,माँ की तरह....

Tuesday, 16 May 2017

कोई अपना है

दूर कहीं से आहट आई लगता है कोई अपना है,
कहते हैं ये हवा के झोंके लगता है कोई अपना है।
खो गया है करार दिल का मारा -मारा फिरता हूँ,
किसने किया है हाल ये मेरा लगता है कोईअपना है।
सात समंदर पार बिठाकर मुझको तन्हा छोड़ दिया,
दिल उसे फिर भी दुआ देता है गता है कोई अपना है।
किसको निगाहें ढूंढ रही हैं किसकी बातें करती हैं,
किसकी याद रुला देती है लगता है कोई अपना है।
दर्द हमेशा ही देता है मुझको सताता है फिर भी,
उसपे हमेशा प्यार आता है लगता है कोई अपना है।

Wednesday, 24 December 2014

दीवाली

वक़्त के थपेड़ों से 
और क़हर ढ़ाने वाले 
सूरज की चिलचिलाती धूप से
जूझकर हर साल की तरह
आ गई है दिवाली 
एक बार फिर से......
मगर इस बार
मेरी दिवाली भी फ़ीकी नही रहेगी
हर बार की तरह
जैसे तेज हवाओं से रहता था
मुझे बुझने का खौ़फ
मेरा वजूद मिटने का ख़ौफ़ 
पर, अब ऐसा नही होगा
क्योंकि 
रख दिया है किसी ने अपना हाथ
मेरे दामन पर
इस बार की दिवाली 
तुम भी आकर देखना
अपनी छत से मेरे आँगन में
इस बार की दिवाली 
मेरे दीपक की लौ भी सतरंगी होगी ।



Wednesday, 13 August 2014

बेवजह......

उफनते हुए बादलों के बीच
चमकती हुई बिजली की
धुँधली सी रोशनी में
देखी थी एक झलक 
उस फ़रेब की
गोया.... वो
फिर से मुझे लूटना चाहता हो
मैंने भी कह दिया आओ
मेरे दामन की सारी ख़ुशियाँ समेटकर
पहले ही ले जा चुके हो
अब यहाँ 
दर्द के सिवाय कुछ भी न पाओगे
बेवजह ख़ाली हाथ जाओगे....

सिर्फ़ पानी हूँ.....

ऐ हवा 
मुझे उनके बारे में कुछ बता
क्या उन्हे भी रहता है 
मेरा इंतज़ार... हर रोज़ 
सूरज की पहली किरण के साथ
क्या वो भी
आकाश के टूटते हुए तारे को देखकर
माँगा करते हैं मुझे 
अपनी दुआओं में
और फिर रात को 
नींद की आग़ोश में जाते-जाते
उदास बिस्तर की सिलवटों पर
उनकी आँखों से आँसू बनकर
मै ही छलकता हूँ
अगर ऐसा है तो जा ऐ हवा जा
उनके पास मेरा ये पैग़ाम पहुँचा
उनसे कहना.....
सारे जहाँ की ख़ाक छानकर
मैंने बस उनके दिल में ही जगह पायी है
मुझे इस तरह आँसूओं के रास्ते न निकालें
क्योंकि उनकी आँखों से निकलकर मैं
सिर्फ़ पानी हूँ ।।

Wednesday, 6 August 2014

माहियाँ......

माहियाँ तैनूँ लखदी अँखियाँ नू
मैं बनके बांवरिया उडंती फिरूँ ....
कहाँ लाज शरम मै भूल गई
तेरे रंग पिया मै घुल गई
तेरी जोगन मैं मेरा जोगी तूँ
माहियाँ तैनूँ लखदी अँखियाँ नू़......
बरसों से हूँ तकती राह तेरी
सून ले तो कभी तू आह मेरी
मेरी रूह तेरी हर साँस तेरी
हर लम्हा मुझे है आस तेरी
आजा के तुम्हारे साथ चलूँ
माहियाँ तैनूँ लखदी अँखियाँ नू....
क़तरा क़तरा मेरे अश्क़ों ने 
नदियों को समन्दर बना दिया
कुछ फ़ासले थे जो दरमियाँ 
मेरे ईश्क की आग ने मिटा दिया
अब आ मेरे हमदम आ भी जा
ऐसे न सता अब आ भी जा
अब अा भी जा २
एक और खलिस पूरी कर दे
मेरी माँग को सिंदूरी कर दे
ख़्वाहिश है मेरी बस इतनी सी 
तेरे साथ जिऊँ तेरे साथ मरूँ
माहियाँ तैनूँ लखदी अँखियाँ नू..